Monday, 11 June 2012

संघ की तथाकथित उपलब्धियां : एक विश्लेषण


दिनांक 6 जून 2012 को बोट क्‍लब पर केन्‍द्रीय सचिवालय राजभाषा सेवा अनुवादक संघ की आमसभा की बैठक सम्‍पन्‍न हुई। इस बैठक में संघ के वर्तमान पदाधिकारियों ने बैठक के एजेंडा से बाहर जाते हुए बैठक की शुरूआत में ही अपनी उपलब्धियों का बखान शुरू कर दिया। अनेकों अनुवादकों को इन तथाकथित उपलब्धियों पर आपत्ति थी। बैठक में सदस्‍यों का समय खराब न हो और बैठक बहस का मंच बन कर न रह जाए इसलिए अनुवादकों की ओर से अपनी बात रख रहे श्री अजय कुमार झा ने सभा को वचन दिया था कि वे सोमवार तक उपलब्धियों पर अनुवादकों का पक्ष रखेंगे। इसी क्रम में उपलब्धियों/नाकामियों का बिन्‍दुवार विश्‍लेषण करते हुए एक विवरण सभी पाठकों के समक्ष प्रस्‍तत है जहां एक ओर भ्रामक सूचनाओं का खंडन किया गया है तो वहीं उप‍लब्धियों की प्रशंसा भी की गई है। 
                                                         - मोडरेटर




श्री शिव कुमार गौड़, श्री बृजभान, श्री इफ्तेखार अहमद, श्री अरूण कुमार विधार्थी, श्री राजेश कुमार श्रीवास्‍तव एवं अन्‍य के नेतृत्‍व में केंद्रीय सचिवालय राजभाषा सेवा अनुवादक एसोसिएशन की कुछ उपल‍ब्धियां:-
सक्रिय अनुवादकों द्वारा प्रस्‍तुत प्रतिक्रिया
1.
कनिष्‍ठ अनुवादक एसोसिएशन और वरिष्‍ठ अनुवादक एसोसिएशन का विलय। वरिष्‍ठ अनुवादक एसोसिएशन का गठन इस एसोसिएशन के पूर्व पदाधिकारियों के हिटलरशाही एवं एकाधिकारवादी रवैये के कारणवश हुआ था जिसकी वजह से पांचवें केंद्रीय वेतन आयोग में भारी नुकसान उठाना पड़ा।
विलय के बावजूद एसोसिएशन के पदाधिकारियों के रवैये में कोई बदलाव नहीं आया। आज के पदाधिकारियों का रवैया भी हिटलरशाही एवं एकाधिकारवादी ही है और यह पॉकेट एसोसिएशन बनकर रह गया है।
2.
पांचवें वेतन आयोग के बाद उच्‍चतर वेतनमान के मामले को दमदार बनाने के लिए शैक्षिक योग्‍यता को स्‍नातक से बढ़वाकर स्‍नात्कोत्‍तर कराया।
शैक्षिक योग्‍यता बढ़ाने के बावजूद आर्थिक लाभ के रूप में अनुवादकों का कुछ नहीं मिला। ग्रेड पे 4200/- है जो नाकाफी है। साथ ही, कर्मचारी चयन आयोग को उम्‍मीदवार नहीं मिल रहे हैं जिसके कारण मंत्रालयों/विभागों में कनिष्‍ठ अनुवादक के पद भारी संख्‍या में रिक्‍त पड़े हैं नजीजतन  मौजूदा अनुवादकों पर काम का ज्‍यादा बोझ आ गया है।

3.
01.01.1986 से वेतनमान बढ़ाने के मामले को उच्‍च न्‍यायालय ले जाया गया और 01.01.1996 से बढ़े हुए वेतनमान मिले।
कैट के फैसले के बावजूद वित्‍त मंत्रालय ने 01.01.1986 से बढ़े वेतनमान देने के मामले को अस्‍वीकृत कर दिया है।

4.
पांचवें केंद्रीय वेतन आयोग की सिफारिशों के फलस्‍वरूप राजभाषा  विभाग द्वारा सहायक निदेशक के दो ग्रेड किए गए जिसके नुकसानदायक होने के कारण इस पर कोर्ट से स्‍टे आदेश लिया गया और इन दो ग्रेडों को समाप्‍त करवाया गया।
मद संख्‍या 4 एवं 5
ये उपलब्धियां अनुवादकों से संबंधित नहीं है।
5.
संयुक्‍त निदेशक और निदेशक के पद पर प्रतिनियुक्ति के विरोध में कैट (CAT) में मामले को ले जाकर इसे लंबी अवधि तक रूकवाने में सफलता प्राप्‍त की।
6.
2006 में भर्ती नियम प्रकाशित होने के बाद उनमें संशोधन कराकर वरिष्‍ठ अनुवादक से सहायक निदेशक के पद पर पदोन्‍नति में कनिष्‍ठ अनुवादक और वरिष्‍ठ अनुवादक स्‍तर पर सात वर्ष की सम्मिलित सेवा का प्रावधान कराया गया । इसी प्रकार सहायक निदेशक से उप निदेशक के पद पर पदोन्‍नति के लिए आठ वर्ष की सम्मिलित सेवा का प्रावधान कराया गया ताकि कार्मिकों को समय पर पदोन्‍नति मिलती रहे।
मद संख्‍या 6 एवं 7
प्रशंस‍नीय कदम । परन्‍तु विभा‍गीय परीक्षा के माध्‍यम से सहायक निदेशक पद पर नियुक्ति की व्‍यवस्‍था हेतु पुरजोर प्रयास किया जाना चाहिए था ।

7.
संघ लोक सेवा आयोग में अपने परिचय और संपर्क का जनहित में उपयोग करके 14-15 वर्षों तक सीधी भर्ती को भर्ती नियमों में प्रावधान होने के बावजूद रूकवाए रखा गया।
8.
भू‍तलक्षी प्रभाव से सभी पदों पर नियमितीकरण प्रारंभ करवाया जिसके परिणास्‍वरूप आज अनेक कार्मिक जल्‍दी पदोन्‍नति पा चुके हैं।
पांच-पांच वर्षों तक किसी वरिष्‍ठ अनुवादक को नियमित नहीं किया गया । एसोसिएशन ने इस संबंध में समय रहते कोई प्रयास नहीं किया ।

9.
छठे केंद्रीय वेतन आयोग में कनिष्‍ठ अनुवादक को सहायक के बराबर रू. 6500-10500 का वेतनमान और वरिष्‍ठ अनुवादक को 7450-11000 का वेतनमान दिलवाया गया।
इसका आर्थिक लाभ कुछ भी नहीं मिला। ग्रेड पे 4200 रुपए और 4600 रुपए ही है। इसका लाभ केवल उन लोगों को प्राप्‍त हुआ जो 1.1.2006 को 6500-10,500 रुपए के वेतनमान में थे।

10.
छठे केंद्रीय वेतन आयोग में सहायक निदेशक के पद को समूह बनवाया गया।

प्रशंसनीय कार्य

11.
तत्‍पश्‍चात 2009 में सरकार द्वारा सहायकों के वेतनमान बढ़ाए जाने के बाद मामले को उच्‍चतम स्‍तर पर उठाया गया। हालांकि, सरकार ने यह अंतिम व्‍यवस्‍था दी है कि यह मामला 01.01.1986 से वेतनमान बढ़ाए जाने के मामले जैसा ही है और 01.01.1986 वाले मामले के अनुरूप ही इसका निपटान किया जा सकता है।

तीन वर्षों के बाद भी कोई प्रगति नहीं हुई है।

12.
01.01.1986 वाले मामले को पुन: कैट (CAT) में ले जाया गया था जिसमें उन्‍होंने अपने 25.05.2010 के आदेश में कनिष्‍ठ अनुवादक, वरिष्‍ठ अनुवादक तथा सहायक निदेशक के वेतनमान 01.01.1986 से नोशनल आधार पर बढ़ाने के निदेश दिए थे, परन्‍तु 29.09.2011 के आदेश द्वारा निरर्थक आधारों पर मामले को अस्‍वीकृत किया है। 

यह कैसी उपलब्धि है?

13.
सरकार के उक्‍त रवैये के खिलाफ मामला पुन: कैट (CAT) में दायर कर दिया गया है।
1.1.1996 से कनिष्‍ठ अनुवादक, वरिष्‍ठ अनुवादक एवं सहायक निदेशक (राजभाषा) को उच्‍चतर वेतनमान दे दिया गया था । अब यह विसंगति पुन: 1.1.2006 से उत्‍पन्‍न हुई है इस मुद्दे को अब तक तार्किक परिणति तक नहीं पहुंचाया जा सका है।

14.
संवर्ग समीक्षा
1)  निदेशक के 06 पद कटने के बचाए गए।
2)  संयुक्‍त निदेशक के पदों को 20 से 36 करवाया गया।
3)  उप निदेशक के 31 पदों को 85 करवाया गया।
iv) सहायक निदेशक के 153 पदों को 202 करवाया गया।
(v) वरिष्‍ठ अनुवादक के 198 पदों को 322 करवाया गया।
(vi इस प्रकार पूरे संवर्ग में पदों की कुल संख्‍या में मैचिंग-सेविंग फार्मूले का सहारा लिए बिना कोई कटौती नहीं वरन् बढ़ोत्‍तरी करवाई गई।
संवर्ग समीक्षा
(i)  इस समीक्षा में यह देखा गया है कि सहायक निदेशक (राजभाषा) के स्‍तर पर पदों में महज 33% की वृद्धि हुई है जबकि उप-निदेशक के पदों के मामले में यह वृद्धि 165-170% हुई है। साफ जाहिर है कि यह एसोसिएशन के कुछ पदाधिकारियों के हित में किया गया है।
(ii) इस संवर्ग पुनर्गठन को वित्‍त मंत्री जी ने 2009 में ही अनुमोदित कर दिया था परंतु कुछ पदाधिकारियों की स्‍वार्थ पूर्ति उन पदों से नहीं हो पा रही थी। लिहाजा, इसे लागू नहीं होने दिया गया जिसके फलस्‍वरूप हमारे कई साथियों को वरिष्‍ठ अनुवादक के पद से ही सेवानिवृत्‍त होना पड़ा और उन्‍हें भारी वित्‍तीय नुकसान हुआ है।


15.
संवर्ग समीक्षा को कार्यन्वित करवाया गया
      कनिष्‍ठ अनुवादक
कनिष्‍ठ अनुवादकों को संवर्ग समीक्षा के कारण बढ़े हुए पदों पर पदोन्‍नति के लिए शुरू से ही प्रयास जारी होने के बावजूद राजभाषा विभाग में अधिकारियों के बीच काम के आवंटन से अड़चने आई । अधिकारियों ने गैर-कानूनी ढंग से सतर्कता निकासी मांगी और देरी करने का हरसंभव तरीका तरीका तलाशा जिसके विरोध में माननीय प्रधानमंत्री श्री मनमोहन सिंह, माननीय यूपीए अध्‍यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी, गांधी, माननीय अखिल भारतीय कांग्रस के महासचिव श्री राहुल गांधी और कुछ प्रख्‍यात हिंदी सेवियों को लिखा गया है और यदि आज की बैठक में अनुमोदित हो जाता है तो अगले सप्‍ताह से राजभाषा विभाग में क्रमिक धरना देने का इस एसोसिएशन का प्रस्‍ताव है।
यह सिर्फ बहाना है सत्‍य से सभी परिचित हैं । उप-निदेशक और सहायक निदेशकों के मामले में पदोन्‍नति आदेश शीघ्र निकाले गए और कनिष्‍ठ अनुवादक अभी तक पदोन्‍नति की आस तक लगाए बैठे हैं

16.
इन सभी बातों के साथ-साथ 01.01.2006 से कनिष्‍ठ अनुवादक एवं वरिष्‍ठ अनुवादक पदों के विलय का मामला व्‍यय विभाग में उच्‍चतर स्‍तर पर प्रक्रियाधीन है जिसे इस कारण जनता से आज तक छुपाया जा रहा था कि इसकी सूचना फैलते ही अन्‍य समानांतर सेवाओं के लोग इसमें कोई अड़चन न डालें।
कृपया अफवाह न फैलाएं । क्‍या लोगों को यह मालूम नहीं है कि इन मामलों की प्रक्रिया एवं अनुमोदन अन्‍य समानांतर सेवाओं के लोगों हाथ में ही है? उन्‍हें सब कुछ मालूम है

17.
भर्ती नियम :-
(i) नए प्रारूप भर्ती नियमों में सहायक निदेशक के पद पर सीधी भर्ती की प्रतशितता को 50 प्रतशित से घटाकर 25 प्रतशित कराया गया और अनुभव में अनुवाद के साथ-साथ राजभाषा नीति कार्यान्‍वयन को भी जोड़ा गया जिससे अधिकांशत: अपनी ही सेवा के लोग इसमें सफल हुए।
(ii) संयुक्‍त निदेशक स्‍तर पर प्रतिनियुक्ति को पूर्णत: हटवाया गया।
(iii) नए भर्ती नियमों को कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग भिजवाया गया और इसमें निदेशक स्‍तर पर की गर्इ प्रतिनियुक्ति की व्‍यवस्‍था को हटाने के लिए कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग को तैयार कर लिया गया है।
(iv) उस वर्ष से किसी कार्मिक को नियमित कराए जाने की व्‍यवस्‍रूथा कराई गई जिस वर्ष की रिक्तियों के मद्दे उसे पदोन्‍नति दी गई।

(i)        क्‍या इसमें सीमित विभागीय परीक्षा की व्‍यवस्‍था कराई गई है?
(ii)   यह मामला अनुवादकों से सीधे तौर पर संबंधित नहीं है।

(iii)  यह मामला अनुवादकों से सीधे तौर पर संबंधित नहीं है।

(iv)     प्रशंसनीय कार्य

18.
आसन्‍न खतरे :-
 (i)        कुछ अनुवादकों/तदर्थ सहायक निदेशकों द्वारा एसोसिएशन के कुछ पदाधिकारियों को व्‍यक्तिगत तौर पर नापसंद किए जाने के कारण वे उन्हें एसोसिएशन में नहीं देखना चाहते हैं, भले ही संवर्ग का भारी अहित हो जाए।
(ii) कुछ कनिष्‍ठ अनुवादक कम अनुभव के कारण इस भारी गलतफहमी में हैं कि वह अपनी शैली, तरीके और शार्टकट से सफलता अर्जित कर लेंगे।
(iii) सीएसओएलएस से ईर्ष्‍या रखने वाले दूसरी सेवाओं के लोग इस ताक में हैं कि इनकी एकता कमजोर हो, ये अस्थिर हों ताकि प्रारूप भर्ती नियमों में बदलाव करके सहायक निदेशक स्‍तर पर 54 प्रतिशत सीधी भर्ती का प्रावधान, संयुक्‍त निदेशक तथा निदेशक स्‍तर पर 60 प्रतिशत प्रतिनियुक्ति तथा वरिष्‍ठ अनुवादक स्‍तर पर 50 प्रतिशत सीधी भर्ती की व्‍यवस्‍था कर सकें। इनकी नियमितीकरण/पदोन्‍नति में अधिकतम देरी कर सकें और कैट (CAT) मामले को अंतिम रूप से दफन करा सकें।

ये सब मनगढ़ंत बातें हैं जो लोगों का ध्‍यान असल मुद्दों से भटकाने के लिए हैं । एसोसिएशन के पदाधिकारी इसका उपयोग अपने व्‍यक्तिगत स्‍वार्थ के लिए कर रहे हैं । ये पदाधिकारी अपनी मनमाफिक स्‍थानांतरण और तैनाती में लगे रहते हैं और अपनी आगे की पदोन्‍नति की राह आसान करने में लगे हुए हैं । अनुवादकों के हितों से संबंधित मुद्दों से इनका वास्‍ता बहुत पहले ही छूट चुका था।
आज इस सेवा में अनुवादकों की क्षमता, शैली, सोच एवं विजन पर कोई प्रश्‍न चिह्न लगाना उचित नहीं है। वे पढ़े-लिखे और इन्‍फार्म्ड हैं । वे अपने मुद्दों को बेहतर तरीके से उठाकर अधिकारियों को प्रभावित कर अपना कार्य करवाने का दमखम रखते हैं । उनमें क्षमता का कोई अभाव नहीं है। कृपया आप उन्‍हें कम कर न आंकें।

सबसे बड़ी बात कि एसोसिएशन के पदाधिकारियों द्वारा  अनुवादकों को एसोसिएशन के कार्यों के संबंध में कभी भी जानकारियां नहीं दी गईं और न ही समय पर आम सभा की बैठकें आयोजित की गईं।   

Saturday, 9 June 2012


महत्‍वपूर्ण संदेश
प्रिय मित्रो, आप सबके अदम्‍य उत्‍साह और सहयोग के बलबूते पर हम 6 जून को सम्‍पन्‍न हुई आम सभा की बैठक में आगामी 17 जुलाई के लिए एसोसिएशन के चुनावों की घोषणा करवाने में कामयाब हुए. इसके लिए आप सब बधाई के पात्र हैं. उम्‍मीद है निर्धारित तिथि पर चुनाव भी होंगे. परंतु चुनावों की यह घोषणा अपने साथ कुछ चुनौतियां भी हमारे समक्ष प्रस्‍तुत करती है. एसोसिएशन के चुनाव अनुवादकों से जुड़े मुद्दों के समाधान की चरणबद्ध प्रक्रिया का एक महत्‍वपूर्ण सोपान हैं जिन्‍हें हमें पूर्णतया लोकतांत्रिक तरीके से सम्‍पन्‍न करना है. संगठन के नाम पर आज एसोसिएशन चंद लोगों के झुण्‍ड से ज्‍यादा कुछ नहीं है. इस लंबी लड़ाई के लिए हमें बहुत जल्‍द एक ऐसा संगठन खडा करना है जिसकी जड़ें बहुत गहरी हों. हर अनुवादक जिसका हिस्‍सा हो. हर व्‍यक्ति जहां जिम्‍मेदारी को निभाने के लिए तैयार हो. हर साथी संगठन की आत्‍मा में विश्‍वास रखे. ऊपर से नीचे तक पूरा संगठन एक सूत्र में पिरोया जाए.
यह किसी एक व्‍यक्ति की निजी लड़ाई नहीं है बल्कि सभी अनुवादकों की सामूहिक लड़ाई है. इसलिए सभी को अपनी जिम्‍मेदारियां निभानी होंगी. इस दिशा में कुछ साथी पहले से कार्य प्रारंभ कर चुके हैं पर अभी भी जमीनी तौर पर बहुत काम करने की आवश्‍यकता है. इसलिए जो साथी आगे आकर इस दिशा में अपना सक्रिय सहयोग देना चा‍हते हैं उनका स्‍वागत है. पर शर्त ये है कि आप मन, वाणी और कर्म से संगठन के प्रति समर्पित हों और निस्‍वार्थ भाव से संगठन की सेवा करने को तैयार हों.

इस बैठक का सबसे बड़ा उद्देश्‍य विभिन्‍न महत्‍वपूर्ण कार्यों के लिए एक वॉलंटियर बेस तैयार करना है।
एक सशक्‍त संगठन का निर्माण कैसे हो ?
वे कौन से मुद्दे हैं जिन पर चुनाव उपरांत कार्य किया जाना है ?

उपरोक्‍त विषयों पर चर्चा एवं संगठन का एक ढांचा खड़ा करने के लिए हमें मिल-बैठ कर रणनीति बनानी होगी. जो लोग सक्रिय होकर भविष्‍य में सहयोग देना चाहते हैं वे दिनांक 15 जून, 2012 को दोपहर 1.00 बजे नॉर्थ ब्‍लॉक के गेट न. 4 के निकट सक्रिय सदस्‍यों की बैठक में आमंत्रित हैं. इस बैठक में भाग लेने के इच्‍छुक अनुवादक साथियों से अनुरोध है कि आप अपनी बैठक में भाग लेने की सूचना अपने संक्षिप्‍त परिचय के साथ दिनांक 13.06.2012 तक संगठन की ई-मेल आई डी translatorsofcsols@yahoo.in पर अवश्‍य दे दें। इस संबंध में की जाने वाली मेल का विषय I am Coming on 15.06.2012 ही लिखें ।
-    मोडरेटर

Friday, 8 June 2012

He who rejects change is the architect of decay.

Dear friends, after the 6th june meeting we have got loads of messages and write-ups for publication. Last day we published an article by Sh. Pandey Rakesh Srivastav, in which he tried to analyse the entire proceedings of AGM rationally. Today, Mr. Awani Karan from Min. of Corporate Affairs is sharing his observations about the recent developments and giving a message to fellow translators.
-Moderator

 He who rejects change is the architect of decay.

We in the cadre are witnessing the ‘rise of a new sun’ of hope and goodwill in our midst. Our association, about which my colleagues have already written and thrown light on its functioning, was in deep slumber or rather behaving like an ostrich when some young turks, sensing the need of the hour, rose to the occasion and voiced the concerns of JHTs and SHTs.
This small step soon started gathering momentum and is now taking the shape of a movement that has made the mathadheeshas worried about their thrones. In that fear, mixed with anger, they are now moving their feet in haste and as is well said ‘haste is waste’, making only fools of themselves. They called AGM of the Association on 06.06.2012 near Boat Club Police Station but willfully failed to circulate the agenda of the meeting. Anyhow, agenda reached us. Items in it are all long pending issues and have not been resolved or rather have been more complicated by these people only. In the AGM they only tried to create chaos and sang songs in their own honor. They are not ready to accept the mistakes they have made. “Mistakes are always forgivable, if one has the courage to admit them.”
No use of talking about their achievements and failures. We have to move forward. Never ascribe to malice. The way ahead is thorny. First of all we have to convince those of our friends who still cant openly raise their voices against wrong or are under the impression that everything is going well and the olds are doing everything for the sake of JHTs and SHTs or fear them for their power and reach. Nothing to fear my friends, be courageous for ‘Courage is not the absence of fear, but rather the judgement that something else is more important than fear’. Also, some of our friends are very angry with the present lot. They need to give right direction to their anger. In times of great stress or adversity, it’s always best to keep busy, to plow your anger and your energy into something positive.
Now massive campaign will be launched to convince us in their support. They want status quo and not change so that वो सारी मलाई चट करते रहे और तलछट हमारे लिए छोड़ दें. He who rejects change is the architect of decay. We have to be careful and nullify their efforts.
Come be united for our common good.

Thursday, 7 June 2012


दबंगई से लोकतंत्र की ओर

अनुवादक एसोसिएशन की बैठक सम्‍पन्‍न 


अनुवादक एसोसिएशन की दिनांक 06.06.12 की बैठक की कार्यवाही अराजक और निंदनीय शोरगुल से भरी थी. आधिकारिक रूप से तो यह बैठक एसोसिएशन की वर्तमान कार्यसमिति द्वारा बुलाई गई थी, पर भाग लेने वाले अनेक सदस्‍यों की तरह मैं भी वहां एसोसिएशन के समानांतर कुछ परिवर्तनकामी सक्रिय जूनियर और सीनियर अनुवादकों की सूचना के आधार पर पहुंचा था. एसोसियशन के कार्यसमिति की मंशा इस बैठक को आम सभा की बैठक बनाने की कितनी थी यह तो नहीं कहा जा सकता, पर इतना जरूर हुआ कि इस बैठक में जूनियर और सीनियर अनुवादकों की जबरदस्‍त भागीदारी हुई. मेरे अपने स्‍मरण में अनुवादकों की ऐसी भागीदारी आम सभा की की किसी बैठक में इससे पहले कभी नहीं हुई थी. अराजकता और शोरगुल बहुत अफसोसजनक था, पर बतौर एक जूनियर अनुवादक मेरे लिए यह एक ऐतिहासिक सुकून से भरी बात हुई कि बैठक में एक निश्चित फैसला निकलकर सामने आया, जब यह घोषणा हो सकी कि एसोसिएसन के चुनाव दिनांक 17.07.2012 को करा लिए जाएंगे. आशा है कुछ ऐसा ही अनुभव मेरे सभी अनुवादक साथियों ने किया होगा.   
अनुवादक साथियों से अपना अनुभव शेयर करने के रूप में मैं कहना चाहूंगा कि बैठक में मची गर्मागर्मी ने यह जाहिर कर दिया कि पिछले 15 वर्षों से काबिज अनुवादक एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने कैडर के भले के लिए कतिपय काम भले ही किए हों, उन्‍होंने लोकतंत्र की आबो-हवा कभी बनने नहीं दी. शक्ति आमसभा और एसोसिएसन के सांस्‍थानिक स्‍वरूप में निहित होनी चाहिए, कुछ व्‍यक्तियों में नहीं. अगर आमसभा की नियमित बैठक, स्‍वस्‍थ चर्चा, नियमित चुनाव, एसोसिएशन के खर्च और कार्यवाहियों का व्‍यवस्थित और अनिवार्य रखरखाव, सभी प्रकार की पारदर्शिता बनाए रखने जैसे काम नहीं होंगे, तो कुछ नेताओं के व्‍‍यक्तिवाद के इर्द गिर्द न्‍यस्‍त स्‍वार्थ, झूठे अहम और दबंगई की मानसिकता का ताना-बाना ही बुनता चला जाएगा. 06.06.12 की बैठक में दबंगई की मानसिकता के कई नजारे देखने को मिले. यह अच्छा हुआ कि अनुवादकों के बीच आकर अपनी गरिमा की हानि होता देखने वाले पदाधिकारियों ने यह मान लिया कि यह एसोसिएशन मूल रूप से अनुवादकों की है, और आगामी चुनाव में मत डालने का अधिकार केवल जूनियर और सीनियर अनुवादकों तक सीमित रहेगा, और तदर्थ सहायक निदेशक भी निर्वाचक मंडल से सम्‍मान पूर्वक बाहर रहेंगे.

वर्तमान एसोसिएशन के पदाधिकारियों का रुझान लोकतंत्र-विरोधी है, यह इससे भी पता चलता है कि इन्होनें जूनियरों को लगभग धकियाते हुए घोषित समय से पूर्व ही बैठक की कार्रवाई आरंभ करनी चाही. घोषित एजेंडा के विषयों को दरकिनार करते हुए एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने अपनी कथित उपलब्धियों का बखान शुरू कर दिया और इस संबंध में एक पर्चा भी बांटा. इस पर्चे का मुख्य लक्ष्य क्या था यह इससे ही स्पष्‍ट होता है कि पर्चे की शुरूआत इस एसोसिएशन से पूर्व की एसोसिएशन के पदाधिकारियों को हिटलशाही का प्रतीक बताते हुए और अंत कनिष्‍ठ अनुवादकों को कम अनुभवी और शॉर्टकट से सफलता चाहने वाला बताते हुए की गई. अर्थात, यह एसोसिएशन ऐसी एसोसिएशन है जिसे अपने इतिहास का सम्मान नहीं और भविष्‍य पर भरोसा नहीं. इस पर्चे में यह भी कहा गया है कि कुछ अनुवादक/तदर्थ सहायक निदेशक एसोसिएशन के कुछ पदाधिकारियों को व्यक्तिगत तौर पर नापसंद करते हैं. निश्चित तौर पर पर्चे का कंटेट स्व-केंद्रित और व्यक्तिवादी था जिसमें एक संस्था के तौर पर एसोसिएशन की गरिमा का सम्मान नहीं परिलक्षित होता है.


बैठक की शुरूआत में एसोसिएसन के पदाधिकारियों ने एसोसिएशन की उपलब्धियां गिनायीं. अनुवादक श्री अजय कुमार झा ने कहा कि कम समय और अराजकता की स्थिति को देखते हुए कथित उपलब्धियों पर क्रमवार चर्चा संभव नहीं है, इसलिए translatorsofcsols.blogspot.in के माध्‍यम से मैं इस चर्चा को आगे बढाउंगा और इन तथाकथित उपलब्धियों की असल कहानी बताउंगा. उन्‍होंने हम अनुवादक साथियों से इस चर्चा में हिस्‍सेदारी का आहवान किया है.
ऐसा महसूस हुआ कि जब कोई और कारगुजारी काम न आई तो कोशिश यह की गई कि रोष को किसी असंगत दिशा में मोड़कर मुख्य मुद्दे से ही ध्यान भटका दिया जाए. शायद इसलिए वर्तमान एसोसिएशन के पदाधिकारियों ने अनुवादकों के ध्‍यान को राजभाषा विभाग की ओर मोड़ने और उसके आगे धरना प्रदर्शन की बात की.

शोरगुल में हमेशा की तरह हम अनुवादकों की आवाज घुटकर रह गई, पर चुनाव की घोषणा निश्चित तौर पर आशा की किरण के रूप में दिखाई दी. बैठक के दौरान ऐसे अनेक नए पुराने अनुवादक नवीन उर्जा से भरे नजर आए, जो हिंदी अनुवादक के लाभ और गरिमा की लडाई को छोटे मोटे गुना भाग के दायरे से बाहर निकालकर बहुत व्‍यापक फलक पर ले जाने के उत्‍सुक और इसके लिए समर्थ दिखे.
हमें अच्‍छे भविष्‍य की कामना करनी चाहिए और इसके लिए सक्रियता दिखानी चाहिए.

                                      पांडेय राकेश श्रीवास्‍तव

Tuesday, 5 June 2012



अनुवादक साथियों के लिए एक संदेश

आज दोपहर दिल्‍ली में राजभाषा सेवा के अनुवादकों के समूह की एक विशेष बैठक आयोजित हुई जिसमें विभिन्‍न मंत्रालयों / कार्यालयों से भारी संख्‍या में अनुवादकों ने भाग लिया । बैठक में केन्‍द्रीय सचिवालय राजभाषा सेवा अनुवादक एसोसिएशन के वर्तमान अध्‍यक्ष श्री शिव कुमार गौड़ द्वारा  06 जून, 2012 को निर्धारित की गई एसोसिएशन की आम सभा की कार्यसूची पर मदवार विचार किया गया । चर्चा के उपरांत उपस्थित अनुवादकों ने सर्वसम्‍मति से कार्यसूची की कुछ मदों को छोड़कर शेष मदों पर आपत्ति जाहिर करते हुए उसे खारिज किया । आम राय यह बनी कि कार्यसूची में 01.01.1986 से वेतनमान बढ़ाए जाने संबंधी, मामले को न्‍यायालय में ले जाने, संयुक्‍त निदेशक एवं निदेशक के पदों को भरा जाना, विभिन्‍न अधिकारियों द्वारा एसोसिएशन के वर्तमान पदाधिकारियों को मिलने के लिए समय न दिया जाना आदि विषय अनुवादकों से संबंधित नहीं हैं । क्‍योंकि यह एसोसिएशन केवल अनुवादकों की है अत: एसोसिएशन की बैठकों में केवल अनुवादकों के हितों से संबंधित विषयों पर ही चर्चा की जानी चाहिए एवं केवल कनिष्‍ठ / वरिष्‍ठ अनुवादकों को ही भाग लेना चाहिए।
बैठक में तय किया गया कि दिनांक 06 जून को होने वाली आम सभा की बैठक में सभी अनुवादकों का एक मात्र एजेंडा एसोसिएशन का चुनाव करवाना है ताकि एसोसिएशन में समुचित संख्‍या में अनुवादकों का प्रतिनिधित्‍व सुनिश्चित किया जा सके और चुनाव उपरांत नवगठित समिति अनुवादकों के हितों से जुड़े विषयों पर संजीदगी से कार्य कर सके ।
अत: सभी अनुवादक साथियों से अपील की जाती है कि दिनांक 06 जून, 2012 को दोपहर 1 बजे बोट क्‍लब, निकट केन्‍द्रीय सचिवालय मैट्रो स्‍टेशन पर होने वाली आम सभा की बैठक में भारी संख्‍या में भाग लें और एक स्‍वर से जल्‍द से जल्‍द एसोसिएशन के चुनाव कराए जाने की मांग का समर्थन करें । दोस्‍तो इस एसोसिएशन के पिछले 15 वर्षों से भी अधिक समय से चुनाव न होने व एसोसिएशन में अनुवादकों का कोई प्रतिनिधित्‍व न होने के कारण अनुवादकों की स्थिति बद से बदतर होती जा रही है । अब वक्‍त आ गया है जब इस ठहरे हुए पानी में गति लाकर इस कैडर की दिशा और दशा में सकारात्‍मक बदलाव लाया जाए।


Friday, 1 June 2012


Time to give farewell to Non-Performers.

Having expressed our heartiest gratitude to the incumbents of the CSOLS’ Translators Association for their hitherto self-drummed achievements and having condoned their failures on some key issues, we have since embarked on roping in the translator’s fraternity. The solemn purpose is to replace the existing slumbered Association with proactive and dynamic one. To this end, our few day’s contact campaign including an informed meeting on 23-05-2012 on boat club has met with tremendous responses. A scintillating feature in our cap is that some AD’s are welcoming our efforts and assuring their best possible co-operation, assistance and guidance.

Translator’s grievances and grudges against the Association are listless. To name a few; arrogant approach of the officer bearers, furtherance of their own interests, misuse of the association’s tag to have an access to the DOL’S as well as other department’s officers for their vested interests, non-operation of any bank account to park the money collected from the members, non-maintenance of income and expenditure account, lack of interaction with members leading to their alienations from the Association, convening meeting only for collecting money, never for sharing and seeking views for the overall progression of the cadre, zero representation of the Jr. translators in the Association, inordinate delay in the matter of promotion of Jr. Translators to Sr. Translators, non-regularization of adhoc Sr. Translators for several years from now, taking a blinkered view of the pitiable profile of Jr. and Sr. Translators in terms of grade pay, so on and so forth.

To bid farewell to the unsavory past time is ripe. Clarion call has been made. Come and join the forum. Put up a formidable diaspora to voice your concerns and get them redressed at the right time.

The way ahead is thorny but with our concerted efforts everything will fall in line.

                “Kon Kahta hai ki asman mein surakh nahi ho sakta, Ek patthar to tabiat se uchhalo yaoro,”

Dinesh K. Singh
       MHA